समाज में राजनीतिक रूप से जागरूक पिछड़ों के प्रति सलीके से ज़हर फैलाया गया है- मनोज़ यादव!

रेलवे आज़ादी के बाद से आज तक केवल लालू यादव के समय में प्रोफ़िट में रही है । लालू यादव ने अपने एक दस्तखत से बिना जात , धर्म देखे लाखों रेलवे कर्मचारियों को ग्रूप D में पक्की नौकरी दे दी थी , फिर भी वो जातिवादी और भ्रष्टाचारी है । नेता जी ने फूलन देवी को संसद पहुँचाया , बेनीप्रसाद वर्मा , रामशरण दास और दूसरे अनगिनत OBC नेताओ को उस मुक़ाम पर पहुँचाया जहाँ पहुँचना किसी भी नेता का ख़्वाब होता है लेकिन फिर भी उन्हें पिछड़ो का नेता ना बोलकर यादवों का नेता या फिर मुल्लायम ही कहा जाता रहा । उन्होंने मोहन सिंह , जनेश्वर मिश्रा , कुँवर रेवती रमन सिंह , अमर सिंह जैसे स्वर्ण नेताओ का हमेशा आदर सम्मान किया लेकिन फिर भी जातिवादी कहलाए । Akhilesh Yadav जी ने अपने कार्यकाल में विकास के नए आयाम लिखे । laptop वितरण , कन्या विद्याधन , समाजवादी पेंशन जैसी सामाजिक स्कीम चलायी तो मेट्रो , एक्सप्रेस वे भी दिया । उनके किसी भी काम में भ्रष्टाचार का कोई आरोप आज तक सरकार नहीं लगा पायी , सारी फ़ाइल खंगालने के बाद जब कुछ नहीं मिला तो टोंटी चुराने का आरोप मढ़ दिया । मीडिया तक में टोंटी पर बहस होने लगी । लेकिन आज तक सरकारी महकमा कोई एक नोटिस राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को नहीं दे पाया जिसमें उनके बंगले से कुछ ग़ायब होने की शिकायत हो ।

यह सारे narrative कौन बनाता है ?? कौन है जो पिछले 100 साल से केवल propaganda फेला रहा है ?? जो लोग यह सारे propaganda फेलाते है उन्होंने समाज , धर्म या देश के लिए कुछ किया है ?? आज़ादी से पहले या आज़ादी के बाद उन्होंने देश को बाँटने की राजनीति के अलावा कुछ नहीं किया ।मुसलमानो और यादवों के ख़िलाफ़ एक रणनीति के तहत समाज में ज़हर घोला गया है ।कल तक सिर्फ़ मुसलमानो का कोई पेरोकार नहीं था , उनकी हत्या और बलात्कार पर भी समाज का एक बड़ा वर्ग जश्न मनाता था , आज वो ही यादवों के साथ हो रहा है । यादवों के ख़िलाफ़ OBC वर्ग में नफ़रत के बीज बड़े सलीक़े से बोए गए है । कल को दूसरे वर्गों के साथ भी यही होगा । हरियाणा में जाट और गुजरात के पटेल इसकी मिसाल है । अन्य समाज के लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि इंस्पेक्टर सुबोध कुमार एक ठाकुर थे और बस्ती और लखनउ में एक तिवारी की हत्या हुई है । यह आग भड़केगी तो कोई विशेष धर्म या विशेष जाति के लोग ही नहीं मरेंगे , नम्बर सबका आएगा और आ रहा है ।समाज को इस प्रोपगेंडा से बाहर निकालना होगा , उन्हें समझाना होगा कि आँख , नाक , कान खोलकर तय करे कि कौन ग़लत है । मीडिया और what’s app university से भी लड़ाई लड़नी होगी क्योंकि इस narrative को बनाने में सबसे बड़ा योगदान इनका ही है ।बातचीत और आपसी मेल मिलाप से ही यह संभव है ।उसके क़त्ल पे में भी चुप था , मेरा नम्बर अब आया ,
मेरे क़त्ल पर आप भी चुप है , अगला नंबर आपका है ।

Published by Cow

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